Sunday, October 17, 2021
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1857 की क्रांति में पटना के पीर अली खान का रोल….

कंही लोग भूल न जाए पटना के पीर अली खान के 1857 में दिए गए बलिदान को  गुमनाम न हो जाए पीर अली की आवाज ।

ब्रिटिश सत्ता के ख़िलाफ़ अनेक वीर योद्धाओं ने अपने शीष हँसते-हँसते मातृभूमि पर न्योछावर कर दिए।

1857 की क्रांति को जब हम याद करते है तो उनमे जिनकी अहम् भूमिका थी,उन्हें तो सब जानते हैं। मगर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो गुमनामी के आगोश में चले गये हैं।उन्हीं में से एक पटना के पीर अली खान थे।

इस क्रांति में देश भले ही आजाद नहीं हुआ था मगर देश को आजाद करवाने के रास्ते खुल गए थे। हजारों लोग तब भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने की जंग में कूद पड़े थे। उन्ही में से एक हीरो पटना से पीर अली खान था। जिसके बारे में इतिहास के पन्नो पर ज्यादा कुछ नहीं लिखा गया है।

पीर अली खां का जन्म 1820 में आजमगढ़ के एक गांव मोहम्मदपुर में हुआ था। किशोरावस्था में वो घर से भागकर पटना आ गए थे। पटना के जमींदार नवाब मीर अब्दुल्ला ने उनकी परवरिश की और पढ़ाया-लिखाया। बड़े होने पर नवाब साहब की मदद से उन्होंने पटना के कुन-कुन सिंह लेन में ज़िल्द साजी की दुकान खोल दी।

उस समय ये भले ही साधारण ज़िल्द साजी की दुकान थी मगर आगे चलकर वही दुकान बिहार के क्रांतिकारियों के जमावड़े का अहम ठिकाना बन गया। क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आने के बाद पीर अली खां दुकान पर क्रांतिकारी साहित्य मंगाकर रखने लगे।

पीर अली ने अंग्रेजों की गुलामी से देश को आज़ाद कराने की मुहिम में अपने हिस्से का योगदान देना अपने जीवन का मकसद बना लिया।  उनका मानना था कि गुलामी की जिंदगी से मौत बेहतर होती है। दिल्ली के प्रमुख क्रांतिकारियों में एक अजीमुल्लाह खान उनके आदर्श थे, जिनके सुझाव और दिशा निर्देश पर वे चलने लगे।

तब पीर अली की अगुवाई में कई टुकड़ियों में बंटकर इन हथियारबंद युवाओं ने पटना के गुलजार बाग में अंग्रेजों के एक प्रशासनिक भवन को चारों तरफ से घेर लिया। यह वही भवन था ,जहां से प्रदेश के लोगों की क्रांतिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी और उनपर कार्रवाई की रूपरेखा तैयार होती थी।

तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर ने भीड़ पर गोलियां चलवाईं। कुछ लोग तो वंही शहीद हो गये मगर पीर अली खान वंहा से भाग निकले। टेलर ने पीर अली खान को सरकारी गवाह बनने को कहा और अपने साथियों का नाम बताने को कहा। ऐसा करने से पीर अली को छोड़ दिया जाता। उन्होंने जो टेलर को उसके बदले में जबाब दिया उससे टेलर भी प्रभावित हो गया था।

पीर अली खान ने कहा कि देश को आज़ादी दिलाने में जान लेना और देना होता है। मगर यह दौर जान देने का है। शायद इस कुर्बानी के खून से लाखो बहादुर पैदा होंगे और एक न एक दिन इस देश को आज़ाद करा लेंगे।

धोखे से 5 जुलाई 1857 को पीर अली और उनके 14 साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। पीर अली पर बग़ावत का आरोप लगाकर उन्हें यातनाएं दी गईं।

और बिना मुक़दमा चलाये 7 जुलाई 1857 को पीर अली को उनके कई साथियों के साथ फांसी पर लटका दिया गया। उन्होंने देश से गद्दारी करने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा।

पीर अली खां से अंग्रेजी हुकूमत इतना खौफ खाती थी कि उन्हें गिरफ्तार करने के दो दिन के अंदर ही बिना कोई मुक़दमा चलाए उन्हें सरेआम फांसी दे दी गई। उनकी कुर्बानी इस देश को कभी नहीं भुलना चाहिए।

इन्हे याद करने के लिए सरकार ने बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान से सटा एक छोटा सा पार्क, शहर से हवाई अड्डे को जोड़ने वाली एक सड़क और पटना का एक मात्र मोहल्ला, इन सभी जगहों पर शहीद पीर अली खान का नाम दर्ज है। शायद यही वज़ह है कि पीर अली खान

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