Wednesday, October 13, 2021
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1857 की क्रांति और बाबू कुंवर सिंह

बिहार : 1857 की क्रांति के बारे में आप सब ने सुना है। उसके नायक मंगल पाण्डेय के बारे में भी सभी जानते होंगे मंगल पाण्डे के उपर तो फ़िल्म भी बनी है। जिसमे आमीर खान द्वारा मंगल पाण्डेय का रोल अदा किया गया है।

आज हम अपने बिहार की बात करते है जिसमे 1857 की क्रांति में बाबू कुंवर सिंह ने भाग लिया था। बिहार से क्रांति का मोर्चा कुवंर सिंह ने संभाल रखा था। और अंग्रेज के दांत खट्टे कर दिए थे। 80 साल के होने के वावजुद भी उनके अंदर अदम्य साहस था।

भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में जन्मे बाबू वीर कुंवर सिंह का जन्म 1777 में प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में हुआ। उनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह एवं इसी खानदान के बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह तथा गजराज सिंह नामी जागीरदार रहे।

बाबू कुंवर सिंह के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह जिला शाहाबाद की कीमती और अतिविशाल जागीरों के मालिक थे। सहृदय और लोकप्रिय कुंवर सिंह को उनके परिजन बहुत चाहते थे। वह अपने गांववासियों में लोकप्रिय थे ही साथ ही।कई ब्रिटिश अधिकारी उनके मित्र रह चुके थे लेकिन इस दोस्ती के कारण वह अंग्रेजनिष्ठ नहीं बने।

1857 की क्रांति के दौरान बाबू कुंवर सिंह की भूमिका काफी महत्वपूर्ण थी।
अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढ़ाया। मंगल पाण्डे की बहादुरी ने सारे देश को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा किया. ऐसे हालात में बाबू कुंवर सिंह ने भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया। उन्होंने 27 अप्रैल, 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ मिलकर आरा नगर पर कब्जा कर लिया। इस तरह कुंवर सिंह का अभियान आरा में जेल तोड़ कर कैदियों की मुक्ति तथा खजाने पर कब्जे से प्रारंभ हुआ.

कुंवर सिंह ने दूसरा मोर्चा बीबीगंज में खोला जहां दो अगस्त, 1857 को अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। जब अंग्रेजी फौज ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई।

स्वतंत्रता सेनानी जगदीशपुर की ओर बढ़ गए। अंग्रजों ने जगदीशपुर पर भयंकर गोलाबारी की। घायलों को भी फांसी पर लटका दिया। महल और दुर्ग खंडहर कर दिए।

कुंवर सिंह सितंबर 1857 में वे रीवा की ओर निकल गए वहां उनकी मुलाकत नाना साहब से हुई और वे एक और जंग करने के लिए बांदा से कालपी पहुंचे लेकिन सर कॉलिन के हाथों तात्या की हार के बाद कुंवर सिंह कालपी नहीं गए और लखनऊ आए। और वंहा नाना शाहब के साथ मिल कर अंग्रेजों के साथ लड़ा और जित भी गए

कुंवर सिंह बिहार की ओर लौटने लगे। जब वे जगदीशपुर जाने के लिए गंगा पार कर रहे थे तभी उनकी बांह में एक अंग्रेजों की गोली आकर लगी। उन्होंने अपनी तलवार से कलाई काटकर नदी में प्रवाहित कर दी। इस तरह से अपनी सेना के साथ जंगलों की ओर चले गए और अंग्रेज़ी सेना को पराजित करके 23 अप्रैल, 1858 को जगदीशपुर पहुंचे। 1857 की क्रान्ति के इस महान नायक अदम्य वीरता का प्रदर्शन करते हुए 26 अप्रैल, 1858 को निधन हो गया।
इस तरह से बाबू कुंवर सिंह ने 1857 की क्रांति में अदम्य सौर्य का साहस दिया। जिनको पुरा बिहार नहीं भूल सकता।

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