Wednesday, October 13, 2021
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रानी लक्ष्मीबाई और 1857 का दौर

बनारस के असी में जन्मी मणिकर्णिका का रानी लक्ष्मीबाई बनने की अमिट कहानी

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इस कविता को सुनते ही दिमाग में वो सारी करियाँ घूमने लगती है। जो 1857 की क्रांति में हुआ था।
सभी लोग बहुत अच्छी तरह से इस कविता के बारे में जानते है। रानी लक्ष्मीबाई के बारे में जितना कहा जाए उतना कम है।
1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मी बाई ने अदम्य साहस का परिचय दिया।

लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। माँ की मृत्यु के बाद घर में मनु घर में बिलकुल अकेली हो गई।
इसलिए पिता मनु को अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे। जहाँ चंचल और सुन्दर मनु को सब लोग उसे प्यार से “छबीली” कहकर बुलाने लगे। बचपन से ही मनु को शस्त्र में रूचि था और इसका अध्ययन भी किया।

सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सितंबर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी।
धीरे-धीरे गंगाराव का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और एक समय ऐसा आया की गंगाराव की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। और उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी गई। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी।

ब्रिटिश (डलहौजी) की डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स की नीति से राज्य का ख़ज़ाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना ख़र्च में से काटने का फ़रमान जारी कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप रानी को झाँसी का क़िला छोड़कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा।
रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी को फिर से लेने का निश्चय कर लिया।

1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई ने इस क्रांति का झण्डा झांसी से लहराया और 1857 की क्रांति में झांसी प्रमुख केन्द्र बन गया।
1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी।

तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ग्वालियर के किले पर कब्ज़ा कर लिया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो गई।

रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की अंतिम आहूति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और स्वतंत्रता के लिए बलिदान का संदेश दिया।

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