Thursday, October 14, 2021
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भारत में उपलब्ध दोनों टिकों कोवीशील्ड और कोवैक्सिन में से किसे लेना ज्यादा सही होगा?

कैसे जाने कि हमारे लिए कौन सा टिका सही रहेगा और कौन सा हार्मफुल हो सकता है |

हालाँकि भारत में अभी तक 35,12,29,497 लोगों ने कोरोना से बचाव के लिए खुद को वैक्सीनेट करा लिया है लेकिन अभी भी अधिकाँश लोगों के ज़ेहन में कुछ सवाल ऐसे घूम रहे हैं जिसकी वज़ह से न तो वे खुद टिका ले पा रहे हैं और न हीं किसी को सही सलाह दे पा रहे हैं | तो आइये जानते हैं दोनों वैक्सीन के निर्माण की कहानी ,कहां विकसित हुई है और किस किस दौर से गुज़री है ?
कोवीशील्ड को ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी और ब्रिटिश फार्मास्युटिकल कंपनी एस्ट्राज़ेनेका ने मिलकर विकसित किया है. कोवीशील्ड पहली ऐसी वैक्सीन है जिसे भारत में क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति मिली थी. इसका उत्पादन दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनियों में से एक सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कर रहा है और भारत के अलावा कई यूरोपीय और अफ्रीकी देशों में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं, कोवैक्सिन भारत में विकसित की गई पहली कोविड-19 वैक्सीन है. इसे हैदराबाद स्थित फार्मा कंपनी भारत बायोटेक ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे के साथ मिलकर बनाया है. यह वैक्सीन सिर्फ दो चरणों के छोटे ट्रायल्स के बावजूद इमरजेंसी इस्तेमाल की अनुमति पाने को लेकर विवादों में रही थी, लेकिन इसके तीसरे चरण के नतीजे विश्वसनीय हैं. चूंकि ये दोनों ही वैक्सीन अब अपना क्लीनिकल ट्रायल पूरा कर चुकी हैं इसलिए इन्हें लगवाते हुए अब किसी तरह का कन्सेंट फॉर्म (सहमति पत्र) भरने की ज़रूरत नहीं रह गई है.

कौन सी वैक्सीन बेहतर तकनीक से बनाई गई है?

कोवीशील्ड आधुनिक वायरल वेक्टर टेक्नॉलजी से बनाई गई वैक्सीन है. इसमें चिंपाज़ियों में सर्दी-जुकाम के लिए जिम्मेदार एडनोवायरस का इस्तेमाल वाहक की तरह किया गया है. इसकी मदद से शरीर में कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन (या कहें वायरस के जेनेटिक कोड्स) को शरीर में पहुंचाने की व्यवस्था की गई है. इस तरह की वैक्सीन से बगैर वायरस का प्रवेश करवाए, अपने आप शरीर में वायरस की मेमोरी सेल्स तैयार की जाती हैं. ऐसा करने से वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स आशंका कम हो जाती है|
दूसरी तरफ, कोवैक्सीन के निर्माण में असक्रिय कोरोना वायरस का इस्तेमाल किया गया है. वायरस के असक्रिय होने के चलते इसमें संक्रमित करने यानी शरीर में पहुंचकर अपनी अनगिनत नकल तैयार करने की क्षमता नहीं रह जाती है. लेकिन इससे शरीर में संक्रमण से लड़ने वाले एंटीबॉडीज बनना शुरू हो जाते हैं. यह वैक्सीन बनाने का दशकों पुराना और आजमाया हुआ तरीका है.

वैक्सीन के निर्धारित डोज़ क्या हैं?

कोवीशील्ड और कोवैक्सिन, दोनों ही इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन के जरिए दी जानी वाली वैक्सीन हैं. कोवीशाल्ड जहां केवल 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को दी जा सकती है, वहीं कोवैक्सिन 12 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए सुरक्षित है लेकिन सरकारी तौर पर अभी इसकी अनुमति नहीं दी गई है. दोनों ही वैक्सीन के दो डोज़ हैं जिनमें से प्रत्येक 0.5 मिली का है. कोवैक्सिन के लिए दोनों डोज़ के बीच रखा गया अंतराल 28 दिनों का है यानी पहला डोज़ लगने के 29वें दिन दूसरा डोज़ लिया जाना चाहिए. भारत में कोवीशील्ड के दोनों डोज़ के बीच 45 दिनों का अंतराल रखा गया था जिसे अब बढ़ाकर चार से आठ हफ्ते कर दिया गया है. लेकिन कई देशों में यह अंतराल 12 हफ्तों तक भी रखा गया है.

कौन सी वैक्सीन ज्यादा प्रभावी है?

वैक्सीन की एफिकेसी (प्रभावोत्पादकता) को उसकी सफलता के बड़े मानकों में गिना जाता है. किसी वैक्सीन की एफिकेसी 90 फीसदी होने का मतलब यह वैक्सीनेटेड ग्रुप में बीमारी होने की संभावना को 90 फीसदी तक कम कर देती है. कोवैक्सिन का एफिकेसी रेट 81% बताया जा रहा है. वहीं, एस्ट्राज़ेनेका या कोवीशील्ड के मामले में दोनों डोज़ में रखे गए समयांतराल के हिसाब से अलग-अलग नतीजे देखने को मिले हैं. हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के प्रमुख अदर पूनावाला का कहना था कि ‘ट्रायल के दौरान जब दोनों डोज़ में एक महीने का अंतर रखा गया तो यह 60-70 फीसदी प्रभावी पाई गई थी लेकिन जब इस गैप को दो-तीन महीने रखकर देखा गया तो एफिकेसी रेट 90% रहा.’ आईसीएमआर ने भी कोवीशील्ड के 90 फीसदी तक प्रभावी होने की बात कही है.

किस वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स ज्यादा हैं?

कोवीशील्ड और कोवैक्सिन, दोनों को ही लगाए जाने के बाद टीके की जगह पर दर्द, सूजन, खुजली, गर्माहट या लाली देखने को मिल सकती है. इसके अलावा वैक्सीन की वजह से बुखार, सिरदर्द, जोड़ों में दर्द, कमजोरी, घबराहट और उल्टी जैसे लक्षण भी देखने को मिल सकते हैं. ज्यादा परेशानी न होने पर पैरासीटामॉल जैसी दवाएं ली जा सकती हैं, अन्यथा तुरंत अस्पताल जाने की सलाह दी जाती है. कोवैक्सिन की तुलना में कोवीशील्ड के साइड इफेक्ट्स कम देखने को मिल रहे हैं. हालांकि यूरोप के कुछ देशों में इसे लगाए जाने के बाद ब्रेन में ब्लड क्लॉट (खून के थक्के जमा होने) बनने के कुछ मामले आए हैं, लेकिन इनकी संख्या न के बराबर ही है. किन लोगों को वैक्सीन नहीं लगवानी चाहिए इस सवाल का जवाब देते हुए वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि अगर किसी को किसी तरह की एलर्जी हो, बुखार हो, किसी तरह का ब्लीडिंग डिसऑर्डर या रोग प्रतिरोधक क्षमता से संबंधित कोई समस्या हो तो उसे वैक्सीन नहीं लगवानी चाहिए. इसके अलावा, गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाओं या प्रेग्नेंसी प्लान कर रही महिलाओं को भी वैक्सीन न लगवाने की सलाह दी जा रही है.
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