Wednesday, October 13, 2021
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गुरु तेग बहादुर के जयंती पर लेखन प्रतियोगिता का आयोजन

सिखों के नवें गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए आत्मबलिदान दे दिया था। गुरु देव का बलिदान दिवस 24 नवंबर को है। उन्हीं के जयंती के अवसर पर राज्य के विद्यालयों, प्रखंडों, जिलों व राज्य स्तर पर सृजनात्मक लेखन प्रतियोगिता का आयोजन होगा।

बिहार : केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के निर्देश पर बिहार शिक्षा परियोजना परिषद ने सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को इस प्रतियोगिता में अधिकाधिक स्कूली विद्यार्थियों के सम्मिलित कराने का आग्रह किया है। ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से होने वाली इस प्रतियोगिता में कक्षा 6 से 12 के विद्यार्थी शामिल हो सकते हैं।

बीईपी के राज्य परियोजना निदेशक संजय सिंह ने जिलों को जानकारी दी है कि सृजनात्मक लेखन प्रतियोगिता छह शीर्षकों के संदर्भित होंगी। ‘गुरु तेग बहादुर का जीवन तथा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, वर्तमान संदर्भ में गुरु तेग बहादुर के विचारों की प्रासंगिकता, वीरता एवं साहस की मिसाल-गुरु तेग बहादुर, बलिदानी महापुरुष तेग बहादुर और गुरु तेज बहादुर के जीवन एवं कार्यों से सीख। इन छह में से किसी एक विषय पर विद्यार्थी लिख सकते हैं।

प्रखंड स्तर पर 1 से 30 सितम्बर, जिला स्तर पर 1 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तथा राज्य स्तर पर 1 से 31 नवम्बर तक प्रतियोगिता का आयोजन कर विद्यार्थियों के सर्वश्रेष्ठ रचनात्मक लेखन का चयन किया जाएगा।

सिखों के नवें गुरु तेग बहादुर का बलिदान

गुरु तेग बहादुर का जन्म बैसाख कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत 1678 यानी 18 अप्रैल, 1621 ई. को अमृतसर नगर में हुआ। इनके पिता छठे गुरु हरगोविंद साहिब थे एवं माता नानकी थी।

बात उस समय की है जब वर्ष 1675 ई. में कश्मीरी पंडितों का एक दल गुरु जी के दरबार में आया और उसने बताया कि औरंगजेब जबरन लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर कर रहा है और ऐसा न करने पर उन पर अत्याचार करता है। उस दल के मुखिया ने गुरु जी से सहायता की याचना की।

नौवें गुरु तेग बहादुर कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा हेतु औरंगजेब से मिलने दिल्ली रवाना हो गए। गुरु जी के सामने तीन शर्ते रखी गईं, ‘इस्लाम कबूल करें, करामात दिखाएं या शहादत दें। गुरु जी ने उत्तर दिया ‘मैं धर्म परिवर्तन के विरुद्ध हूं। और चमत्कार दिखाना ईश्वर की इच्छा की अवहेलना है।

इसके बाद गुरु जी के साथ आए तीन सिखों भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला को यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया।

औरंगजेब ने गुरु जी पर भी अनेक अत्याचार किए, परंतु वे अविचलित रहे। अंतत: आठ दिनों की यातना के बाद 24 नवंबर 1675 ई. को गुरु जी को दिल्ली के चांदनी चौक में शीश काटकर शहीद कर दिया गया।

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