Thursday, October 14, 2021
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कैंसर ला-इलाज नहीं ज़रूरत है नये आयामों को पहचानने की

बिहार : रोज मर्रा की जिंदगी में हमें अपने लिए समय ही नहीं मिलता है ,दुनिया बहुत आगे बढ़ रही है ,वैज्ञानिक नये-नये खोज कर रहें हैं।

इन्हीं खोजो में एक है क्रिस्पर कैस -9 तकनीक यह कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल में लाई गई तकनीक है।
जिसे हाल ही में इजराइली वैज्ञानिकों ने चूहों पर शोध के “क्रिस्पर कैस-9” नाम दिया है।

कैंसर जिसने न जाने अब तक कितने लोगों की जान ली है। जिसे सुनते ही जिसे सुनते ही डर से धड़कनों की रफ़्तार तेज हो जाती है।
जिस किसी को यह बीमारी लग जाए तो इसकी ख़ौफ से ही उसकी जिंदगी घटने लगती है। उस घर की आर्थिक स्थिति भी ख़राब हो जाती है।
अंत में मरीज़ के साथ उसके परिजन भी हॉस्पिटल के चक्कर लगा उसके क्र थक जाते हैं।

1910 में प्रकाशित ,भारत में कैंसर का ब्योरा वर्ष 1860 से 1910 के बिच इंडियन मेडिकल सर्विस के डॉक्टरों द्वारा पूरे भारत में कई ऑडिट्स किए गए और कैंसर संबंधी मामलों का ब्यौरा प्रकाशित किया गया था।

इन आठ राज्यों में सबसे ज्यादा ख़तरा है –
भारत में कैंसर की स्थिति पर अध्ययन से पता चला है कि प्रत्येक 20 वर्षों में कैंसर के मांमले में दोगुने स्तर पर बृद्धि हो रही है।
कैंसर का सबसे ज्यादा ख़तरा भारत के उन राज्यों को है जिनकी शिक्षा का स्तर सामान्य से भी कम है। जैसे-उत्तरप्रदेश ,बिहार ,झारखंड ,मध्यप्रदेश ,छतीसगढ ,ओडिशा ,आदि।

उपचार की बात –
भारतीय शोध कर्ताओं के अनुसार इन राज्यों की मौजूदा हालात में जल्द सुधार नहीं हुआ तो स्थिति उम्मीदों से ज़्यादा खतरनाक हो सकती है। देश में इस रोग की इलाज के लिए आधारभूत ढाँचे का भारी अभाव है। निजी अस्पतालों की सुविधा सामान्य जन से सरोकार नहीं रखती।
वर्तमान में किमोथेरेपी ,रेडिएशन और ऑप्रेशन ही इसका एक मात्र इलाज है।

लेकिन किमोथेरेपी और रेडिएशन की वजह से मरीज की स्थिति दिन ब दिन बहुत गंभीर होती जाती है, क्यूंकि इस इलाज के दौरान कैंसर सेल्स के साथ वैसे सेल्स भी ख़त्म हो जाते हैं जो शरीर के लिए लाभकारी होते हैं।

क्या है “क्रिस्पर कैस-9” तकनीक
इस प्रक्रिया के द्वारा स्वस्थ सेल्स को बिना क्षति पहुंचाये कैंसर से जूझ रहे मरीजों के DNA में बारीक़ से बारीक़ काट छांट संभव है। इसकी ख़ासियत यह है कि कैंसर के इलाज में प्रयुक्त अन्य तकनिक जैसे.. किमोथेरेपी ,रेडिओथेरेपी की तरह बिलकुल भी नुकसानदेय नहीं है।
इस तकनीक से नस्ट होने वाली कैंसर सेल्स दोबारा कभी सक्रीय नहीं हो पाती।

इस अनुसंधान में ब्रेन और गर्भाशय के कैंसर से जूझ रहे चूहों के इलाज में “क्रिस्पर कैस-9” तकनीक की उपयोगिता आंकी गई। इस दौरान जो चुहे इस प्रक्रिया से उबरे उनमे बिमारी से उबर पाने की गुंजाइस 30% और बढ़ गई है।

कंटेंट डेस्क

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